सारंगढ़-बिलाईगढ़।जिले के अभ्यारण क्षेत्र में रहने वाले हजारों ग्रामीण आज भी अपने बुनियादी अधिकारों और वनाधारित आजीविका के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं। तेंदूपत्ता संग्रहण जैसे पारंपरिक रोजगार पर आश्रित 28 गांवों के अभ्यारणवासियों का आरोप है कि संग्राहक कार्ड जारी नहीं किए जाने के कारण उन्हें अपनी मेहनत की कमाई बिचौलियों के हाथों औने-पौने दामों में बेचनी पड़ रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि जहां शासन द्वारा तेंदूपत्ता की खरीदी निर्धारित दर पर किए जाने का दावा किया जाता है, वहीं अभ्यारण क्षेत्र के लोगों को प्रति सैकड़ा मात्र 400 से 450 रुपये में तेंदूपत्ता बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। संग्राहक कार्ड नहीं होने के कारण वे वन विभाग की विभिन्न योजनाओं के लाभ से भी वंचित हैं।
ग्रामीणों ने पीड़ा व्यक्त करते हुए बताया कि वर्षों से संग्राहक कार्ड जारी करने की मांग की जा रही है, लेकिन अब तक उनकी सुनवाई नहीं हुई। उनका कहना है कि जंगल, जल और जमीन से जीवन चलाने वाले अभ्यारणवासी आज अपने ही अधिकारों के लिए भटकने को मजबूर हैं।
“अभ्यारण के नाम पर शोषण” का आरोप
ग्रामीणों के अनुसार अभ्यारण क्षेत्र में रहने वाले लगभग 3600 परिवार लंबे समय से उपेक्षा का शिकार हैं। वर्ष 2016 और 2017 में सामाजिक कार्यकर्ता रामकुमार थूरिया के नेतृत्व में शासकीय हाई स्कूल मैदान में सम्मेलन आयोजित कर सरकार से क्षतिपूर्ति राशि देने की मांग की गई थी। इसके बाद कैंपा मद से प्रत्येक परिवार को 2000 रुपये की सहायता राशि मिलनी शुरू हुई, लेकिन वर्ष 2018 के बाद यह सहायता बंद हो गई।
ग्रामीणों का आरोप है कि सरकार बदलने और कैंपा निधि बंद होने के बाद अभ्यारणवासियों की समस्याएं फिर से अनदेखी कर दी गईं।
“रोजगार छीना, अधिकार रोके”
ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि अभ्यारण क्षेत्र के लोगों को कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। आरोप है कि—
किसानों की जमीनों के क्रय-विक्रय पर रोक है
वनाधारित रोजगार के अवसर सीमित हो गए हैं
परंपरागत वन निवासियों को वन अधिकार पट्टा मिलने में बाधाएं आ रही हैं
ग्राम पंचायतों के विकास कार्यों में विभागीय अड़चनें डाली जा रही हैं
प्रधानमंत्री आवास निर्माण के लिए स्थानीय नदी-नालों से बालू निकालने पर भी कार्रवाई का डर दिखाया जाता है
चक्का जाम से लेकर कोर्ट तक की लड़ाई
ग्रामीणों ने बताया कि अपनी मांगों को लेकर 30 जनवरी 2023 को राष्ट्रीय राजमार्ग पर चक्का जाम कर विरोध प्रदर्शन भी किया गया था, लेकिन आज तक उनकी समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं हो पाया।
सामाजिक कार्यकर्ता रामकुमार थूरिया ने कहा कि शासन तेंदूपत्ता खरीदी की बड़ी घोषणाएं तो करता है, लेकिन अभ्यारण क्षेत्र के लोगों को उसका लाभ नहीं मिल रहा। उन्होंने आरोप लगाया कि अभ्यारणवासियों को योजनाबद्ध तरीके से अधिकारों और सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि अब यह लड़ाई न्यायालयीन तरीके से लड़ी जाएगी और अभ्यारणवासियों के हक-अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी कदम उठाए जाएंगे।
“जंगल हमारा, लेकिन अधिकार अधूरे”
अभ्यारण क्षेत्र के ग्रामीणों की आंखों में आज भी एक उम्मीद है—कि उन्हें भी सम्मानपूर्वक जीने, अपनी मेहनत का उचित मूल्य पाने और विकास की मुख्यधारा से जुड़ने का अधिकार मिले। लेकिन वर्षों से लंबित मांगों और प्रशासनिक उदासीनता ने उनके भीतर गहरी निराशा और नाराजगी पैदा कर दी है।
